मैंने मान लिया कि तुझको भुलाया नहीं जाता…।
मुद्दत से तुझे लिखा था दिल पर ।
मैं क्या करूँ मिटाया नहीं जाता…।
यह केवल शब्द नहीं है यह हमारे जीवन का अनुभव है। यह कोई सांसारिक मोह नहीं, यह उस चेतना के प्रति प्रेम है जिसने जीवन को दिशा दी, अर्थ दिया, और भीतर सोई हुई संभावना को जगाया।
गुरु केवल व्यक्ति नहीं होते, वे एक उपस्थिति होते हैं। एक ऐसी उपस्थिति, जो आँखों से ओझल हो सकती है, पर हृदय से कभी नहीं जाती। हम सब जीवन में बहुत कुछ देखते है —संघर्ष करते है , सफलताए - असफलताएँ, उतार-चढ़ाव— पर जब भी मन ने हार मानने की सोचता है , तब गुरुदेव की मुस्कान और उनका एक वाक्य संभाल लेता है।
"जो हो रहा है, उसे स्वीकारो; जो करना है, उसे पूरी निष्ठा से करो।"
आर्ट ऑफ लिविंग के साधना, सेवा और सत्संग—ये तीन स्तंभ केवल कार्यक्रम नहीं हैं, ये जीवन की हैं।
आध्यात्मिकता भागने का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से जीने का नाम है।
कभी-कभी लोग पूछते हैं—“क्या गुरु हमेशा साथ रहते हैं?”
हम मुस्कुरा देते है। क्योंकि यह साथ बाहरी नहीं, भीतरी होता है। जब ध्यान में बैठते है , जब प्राणायाम की गहराई में उतरते है , सेवा करते है तब महसूस होता है कि गुरुदेव का प्रेम एक ऊर्जा की तरह प्रवाहित हो रहा है।
आँखों से उनकी याद का साया इसलिए नहीं जाता क्योंकि वह याद नहीं, वह चेतना है।
मान लिया कि उन्हें भुलाया नहीं जा सकता क्योंकि वह व्यक्ति नहीं, वह जीवन-दर्शन हैं।
मुद्दत से उन्हें दिल पर लिखा है, क्योंकि उन्होंने सिखाया—
“स्वयं को पहचानो, सेवा में जियो, और प्रेम को अपना स्वभाव बनाओ।”
आज महाराष्ट्र के कोने-कोने में जब हम ध्यान, प्राणायाम, सुदर्शन क्रिया के माध्यम से लोगों के जीवन में परिवर्तन देखते हैं, तो लगता है कि यह सब उसी प्रेम की अभिव्यक्ति है।
गुरु की याद कोई भावुकता नहीं, यह एक जागृति है। यह वह दीपक है जो भीतर जलता है और अंधकार को दूर करता है।
गुरुदेव ने हमें सिखाया कि जीवन एक उत्सव है।
जब हम शिकायत छोड़कर कृतज्ञता अपनाते हैं, जब हम अपेक्षा छोड़कर सेवा करते हैं, जब हम भय छोड़कर विश्वास करते हैं—तभी गुरु का सच्चा स्मरण होता है।
आज भी जब स्मरण होता है, तो मन कह उठता है—
“मेरी आँखों से तेरी याद का साया नहीं जाता…”
और उसी क्षण भीतर से उत्तर आता है—
गुरु कोई बाहर की छवि नहीं, वे भीतर की जागृत चेतना हैं।
आपका
फिरोज
